“भूली हुई ज़िंदगी फिर जीना सीख रही हूँ” (Motivational Poem In Hindi) Inspirational Poem

“भूली हुई ज़िंदगी फिर जीना सीख रही हूँ” (Motivational Poem In Hindi) Inspirational Poem

Motivational Poem in Hindi

कटा करती थी जो जिंदगी उदासीनता के साथ,
आज उसे जीना सीख रही हूँ

लहरों में डूबकर , कश्ती को संभालने की फिर कोशिश कर रही हूँ

कलम की सूखी श्याही को आँसुओ से भिगो कर,
खुशी के कुछ एहसास काग़ज पर लिख रही हूँ
भूली हुई ज़िंदगी फिर जीना सीख रही हूँ

मन के भीतर वो छोटी सी मुस्कान जो खो गयी थी अंधेरों में , फिर वो मुख पर सजा रही हूँ

कंठ में सुप्त स्वर को फिर गुनगुना रही हूँ,
भूली हुई ज़िंदगी फिर जीना सीख रही हूँ

Motivational Poem In Hindi

बहुत गुजर गयी ज़िंदगी समझदारी में, अब फिर बालपन की और लौट रही हूँ

कुछ अठखेलियाँ मन को भा गयी है मैं फिर नादानियां कर रही हूँ

बचपन की बारिश में , काग़ज़ की कश्ती का वो सफर फिर तय कर रही हूँ,
भूली हुई ज़िंदगी फिर जीना सीख रही हूँ

जीना भूल गयी थी खुद के लिए, फिर प्राणवान् हो उठी हूँ,
भूली हुई जिंदगी फिर जीना सीख रही हूँ

माना कोई न था प्रेम करने वाला पर मेरे भीतर तो प्रेम था, अपने ही प्रेम से खुद को प्रेम कर रही हूँ
भूली हुई जिंदगी फिर जीना सीख रही हूँ

मुरझा गयी थी सूखे फूल की तरह आज फिर से खिल उठी , खुशी की पराकाष्ठा छू रही हूँ
भूली हुई जिंदगी फिर जीना सीख रही हूँ…….

बुढ़ापे की और बढ़ती उम्र फिर जवान हो रही है, डग- मग कदमों से मंजिल की और बहे जा रही हूँ
भूली हुई जिंदगी फिर जीना सीख रही हूँ

दिल को थाम लिया मैंने धड़कनों की आवाज फिर सुन रही हूँ, ताउम्र खुश रहने की नई कला सीख रही हूँ
भूली हुई जिंदगी फिर जीना सीख रही हूँ
मैं, फिर जीना सीख रही हूँ……

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Mehak Bhatia

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